राजनीति एक ऐसा खेल है जिसमें शह और मात का कलाबाज़ी निरंतर जारी रहता है. कभी कभी बदलते मौसम की तरह ये करवट लेता है तो कभी नदी में बहते पानी की तरह. जिसमें कभी साफ पानी प्रवाहित नजर आता है तो कभी गंदले पानी में बहता कचरे का अंबार. तो कभी नदी के सतह पर उग आये जंगलों के बीच पानी की तलाश.
भारतीय राजनीति भी कुछ ऐसे ही भंवर में उलझी नजर आ रही है. लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा जिस तरह जदयू और तेदेपा पर अपनी सत्ता बचाने के लिए आश्रित हो गई है तब से लोगों को लगने लगा है कि भाजपा कमजोर हो गई है. सच्चाई क्या है ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा? लेकिन इतना तय है कि वर्तमान में नरेंद्र मोदी किसी को कोई क्रेडिट देने के मूड में नहीं दिख रहे हैं.
एक तरफ भारत में जहां आरक्षण का नया खेल शुरू हो गया है वहीं वोटबैंक की राजनीति में जातीयता का खेल भी अपने चरम की ओर बढ़ रहा है. जैसे अगड़ा -पिछड़ा की लड़ाई पहले से ही चली आ रही थी और नब्बे के दशक के शुरूआत में मंडल -कमंडल की मुहिम ने उसे एक अलग रंग में रंग दिया. वैसे ही अब जाति जनगणना की मुहिम नया रंग में रंगने के लिए तैयार है. बिहार जैसे कुछ राज्य में जनगणना का नाम बदलकर जाति जनगणना करा लिया गया है और अब केंद्र सरकार पर इसके लिए दबाब बनाने की मुहिम शुरू हो गई है. 18 सितंबर 2024 से जनगणना कार्य शुरू करने का प्रस्ताव भी रखा गया है. होगा क्या ये वक्त बताएगा?
इसी बीच राजनीति एक नये और आक्रमक स्वरूप में उभरता हुआ नजर आ रहा है. लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी अब हर मुद्दा को चुनौती के रूप में उठाने लगे हैं. हाल में उनका एक और बयान ग़ौरतलब है. वे कहते हैं कि "जाति जनगणना को कोई भी शक्ति नहीं रोक सकती है. इसके लिए प्रधानमंत्री या तो आदेश (आर्डर) जारी करें या दूसरा प्रधानमंत्री करेंगे." यह बयान वस्तुस्थिति को स्पष्ट करता है. क्या विपक्षी नेता का यह बयान राजनीतिक मर्यादा के अधीन माना जा सकता है? नैतिकता आदि की बात आज की राजनीति में तो दुर्लभ वस्तु बन गई है.
जो कुछ भी हो लेकिन जनगणना होना तो तय है लेकिन जाति जनगणना होगा कि नहीं ये वक्त बताएगा. लेकिन इतना तय है कि नरेंद्र मोदी राहुल गांधी को इसका श्रेय लेने शायद ही दें. जाति जनगणना हो भी जाय, जिसकी संभावना अब बहुत अधिक है तो भी कोई न कोई नुक्ता शेष रहेगा ही, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है.
और जब जाति जनगणना हो जाएगा तो फिर छिड़ेगी मुहिम आरक्षण की. जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण की मांग. और इस संघर्ष का परिणाम क्या होगा? भविष्य में समाज का स्वरूप कैसा होगा? सबकुछ शांति से हो जाय इसकी संभावना तो बहुत कम है. लेकिन चीजें धीरे धीरे ही बेपर्द होगी. भविष्य की घटनाओं के लिए पहले ही कुछ कह देना भी बेइमानी ही है इसलिए इंतजार किया जाय सही वक्त का ...
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